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अदालती फैसला: पास्टर संतोष श्रीवास को मिली क्लीन चिट, प्रार्थना सभा में पुलिस की कार्यवाही पर लगी रोक

 

 

कोरबा जिले के कलमीभांठा, तिलकेजा क्षेत्र में गृह-कलीसिया संचालित करने के मामले में न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, कोरबा, श्री सत्यानंद प्रसाद ने मसीही भाई संतोष कुमार श्रीवास के पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें आरोपों से मुक्त कर दिया है।

घटना का विवरण:
यह मामला 28 सितंबर 2025 का है, जब कलमीभाठा में पास्टर संतोष श्रीवास के निवास पर साप्ताहिक प्रार्थना सभा आयोजित की जा रही थी। दोपहर के समय कुछ असामाजिक तत्वों और हिंदूवादी संगठन के सदस्यों ने घर में घुसकर धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए हंगामा और हमला कर दिया था। घटना की सूचना मिलते ही christian working committee के अध्यक्ष श्री विजय मेश्राम व कमिटी के सदस्य तत्काल मौके पर पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया।

पुलिस की विवादित कार्रवाई:
घटना के बाद क्रिश्चियन वर्किंग कमिटी ने पास्टर की ओर से हमलावरों के खिलाफ उरगा थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई। हालांकि, पुलिस ने हमलावरों पर कार्रवाई करने के बजाय, विरोधियों की शिकायत पर पास्टर संतोष श्रीवास के खिलाफ ही मामला दर्ज कर लिया।

न्यायालय का रुख और बचाव पक्ष के तर्क:
क्रिश्चियन वर्किंग कमिटी के अध्यक्ष श्री विजय मेश्राम जी ने पीड़ित पक्ष के न्याय के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता अनुराग मोहित को अपना वकील नियुक्त किया। न्यायालय में अधिवक्ता अनुराग मोहित ने तर्क दिया कि:

👉प्रार्थना सभा पूरी तरह से शांतिपूर्ण थी और इसमें किसी भी प्रकार का जबरन धर्मांतरण नहीं कराया जा रहा था।
👉संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने और प्रार्थना करने का मौलिक अधिकार है।
👉पुलिस की कार्रवाई एकतरफा और बिना ठोस सबूतों के की गई थी।

अंतिम फैसला
तथ्यों और दलीलों को सुनने के बाद, न्यायालय ने पास्टर श्रीवास के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके खिलाफ दर्ज केस को रद्द (Quash) कर दिया। साथ ही, न्यायालय ने सख्त निर्देश दिए कि भविष्य में प्रार्थना सभाओं में पुलिस द्वारा बिना किसी ठोस आधार के हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
इस फैसले का मसीह समाज और क्रिश्चियन वर्किंग कमेटी ने स्वागत किया है, इसे सत्य और संवैधानिक अधिकारों की जीत बताया है।

मामले की मुख्य बातें:

आरोप: उरगा थाना क्षेत्र के अंतर्गत पुलिस प्रशासन द्वारा मना किए जाने के बावजूद गृह-कलीसिया (प्रार्थना सभा) संचालित करने के कारण संतोष कुमार श्रीवास के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

कानूनी स्थितिः धारा 223 (लोक सेवक के आदेश की अवज्ञा) एक वर्ष तक के कारावास से दंडनीय अपराध है। चूंकि यह एक समन मामला था, इसलिए इसकी प्रक्रिया संक्षिप्त थी।

न्यायालय का निर्णय: दिनांक 28.03.2026 को
सुनाए गए अपने फैसले में माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आरोपी के विरुद्ध धारा 223 BNS के तहत कार्यवाही विधि अनुसार जारी नहीं रखी जा सकती।

उन्मोचन (Discharge): न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 281 के प्रावधानों का उपयोग करते हुए कानूनी कार्यवाही को तत्काल प्रभाव से रोक दिया और संतोष कुमार श्रीवास को आरोपों से उन्मोचित (Discharged) कर दिया।